शुक्रवार 31 जुलाई 2026 - 20:06
विलायत की रक्षा ही इमाम-ए-अस्र (अ) की नुसरत का वास्तविक ज़रिया है

जामिया इमाम अमीरुल मोमिनीन (अ) नजफी हाउस मुंबई के मुदीर, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद अहमद अली आबिदी ने 15 सफ़र अल मुज़फ़्फ़र को नजफ़-ए-अशरफ़ के मदरसा इमाम हसन अल-मुज्तबा (अ) में आयोजित मजलिस-ए-अज़ा से ख़िताब करते हुए फ़रमाया कि इमाम-ए-अस्र (अ) के सच्चे नासिर बनने के लिए विलायत का बचाव और अहल-ए-बैत (अ) के अक़ाइद की हिफ़ाज़त अनिवार्य है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद अहमद अली आबिदी ने कहा कि ज़ियारत-ए-आशूरा अपनी सनद और फ़ुक़हा-ए-किराम के निरंतर अमल के लिहाज़ से बहुत ही मोतबर  ज़ियारत है। अगर यह ज़ियारत मोतबर न होती तो अइम्मा-ए-अहल-ए-बैत (अ) इसके पढ़ने पर इतनी ज़ोर न देते। उन्होंने बताया कि इस ज़ियारत में दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत (अ) पर लानत के बाद सबसे अहम दुआ यह है कि अल्लाह तआला हमें इमाम हुसैन (अ) के ख़ून का बदला लेने वालों में, इमाम-ए-मंसूर और इमाम-ए-हक़ के साथ शामिल फ़रमाए। इस दुआ का ज़ियारत में दो बार दोहराया जाना इसकी असामान्य अहमियत को ज़ाहिर करता है।

मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने कहा कि तमाम औलिया-ए-इलाही और अइम्मा-ए-मासूमीन (अ) की यही इच्छा रही है कि वे इमाम-ए-हक़ के अनसार में शुमार हों। इमाम के नासिर बनने का रास्ता सिर्फ़ दावों से नहीं बल्कि विलायत के बचाव से हमवार होता है, क्योंकि इस्लाम की हक़ीक़ी पहचान और हक़ व बातिल के बीच फ़र्क करने का मापदंड विलायत-ए-अहल-ए-बैत (अ) ही है। दुश्मन हमेशा विलायत को ही अपना निशाना बनाते रहे हैं।

उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) और हिशाम बिन हकम का वाक़िया बयान करते हुए कहा कि इमाम (अ) ने मजलिस में मौजूद बुज़ुर्ग अस्हाब के होते हुए भी हिशाम बिन हकम को अपने करीब जगह दी, क्योंकि उन्होंने विलायत और अक़ाइद-ए-अहल-ए-बैत (अ) का भरपूर बचाव किया था। इसी तरह एक और वाक़िए का ज़िक्र करते हुए बताया कि इमाम (अ) ने एक गुमनाम शख़्स को क़बायली सरदारों पर तरजीह दी, क्योंकि उसने अहल-ए-बैत (अ) की शिक्षाओं की रौशनी में शियाओं के अक़ाइद का बचाव किया था और मुख़ालिफ़ीन के शुबुहात और शक-व-शुबहों का दूर किया था। इमाम (अ) ने उसकी फ़ज़ीलत की दलील क़ुरआन-ए-करीम की आयत "يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ" (अल्लाह तुम में से ईमान वालों और जिन्हें इल्म दिया गया है, के दर्जे बुलंद करता है) से पेश की।

उन्होंने कहा कि आज भी इमाम-ए-अस्र (अ) से कुर्बत  हासिल करने का रास्ता वही है जो हिशाम बिन हकम ने इख़्तियार किया था, यानी विलायत का बचाव, अक़ाइद-ए-अहल-ए-बैत (अ) की हिफ़ाज़त और हक़ की तबलीग़। उन्होंने ताकीद कहा कि इमाम-ए-ज़माना (अ) के सच्चे नासिर वही हैं जो हर दौर में विलायत का बचाव करें।

ख़िताब के अंत में मौलाना सय्यद अहमद अली आबिदी ने कहा कि अरबईन-ए-हुसैनी (अ) के असली अज़ादार और साहिब-ए-अज़ा ख़ुद इमाम-ए-ज़माना हज़रत महदी (अ) हैं, इसलिए हर मोमिन को चाहिए कि वह अपने अक़ीदे, किरदार और अमल के ज़रिए इमाम (अ) की नुसरत और विलायत के बचाव की ज़िम्मेदारी अदा करे।

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